Thursday, October 13, 2016

मेरी रगों की स्याही के लिये ...



बहुत मुश्किल है पिता पर लिखना ....
बहुत मुश्किल है, उनके लिये कुछ लिखना जो कुछ नहीं कहते ...
भरे रहते हैं तालाब की तरह, नदी की तरह नहीं बहते ...
घरभर की छांव के लिए, जो रोज़ धूप सहते ...
दुनियाबी तार सप्तक में जो रोज़ नये स्वर गहते
पापा...
टेलिफोन पर आपकी धड़कने सुन नहीं पाता ...
स्मृतियां ले जाती हैं, उस कैनवास पर ...
नन्हीं हथेली से जब तौलता था आपकी थपकी ...
आपके साये से चिपकी रहती थी मेरी आंखें ...
कैसे आपकी कमीज़ से मेरे सौदे पर खुश रहते थे आप ...
कैसे मां की घुड़की पर, मैं मान जाता था आपकी अठन्नी से ...
रोज़ आपकी लड़ाई देखता रहता था ...
देखता था कि कैसे पिता कभी नहीं हारते ...
आपकी लड़ाई में, मैं अपनी जीत ढूंढ ही लेता था ...
अलसाई सुबह और बिस्तर की सिकुड़न में टटोलता हूं आपको ...
शब्दों के भीतर आप आसानी से नहीं आते ...
तस्वीरों में, फोन की घंटी में ...
देख नहीं पाता आपके पैरों का दर्द, कहते नहीं आप ज़रा सिर पर हाथ फिरा दो...
और भी कई यादें हैं, पूरे घर में यहां वहां बिखरी पड़ी हैं ...
जब रात में देखता हूं तारे, मेरे अकेलेपन के आकाश में आ जाते हैं आप ...
मेरी उंगलियों में आप धड़कने लगते हैं, मेरी आंखें में सारे मंज़र हो जाते हैं कैद
जहां आपकी आवाज़ टूटती नहीं, अनंत तक मेरे साथ होती है ...
ना होता है दुख, ना बेचैनी .... सिवाय आपके मेरे उस अनंत में
पापा
जाने क्यों, आपमें मुझे थोड़ी-थोड़ी मां भी नज़र आती है ...
मेरी ख़ामोशी में छुपकर आपका जहां रहता है ..
हर दिन वो मुझसे यही कहता है ...
आप हैं तो है मेरा वजूद!

Thursday, February 18, 2016

साथी कन्हैया के लिए खुला ख़त

प्रिय कन्हैया,
मुझे नहीं पता तुम जेल से कब बाहर आओगे, मुझे ये भी पता है कि धर्म में तुम्हारी आस्था नहीं है, फिर भी कोशिश है अपने तर्कों के साथ तुम्हारे साथियों को मनाने की ... समझाने की कोशिश करूं ...
सबसे पहले बता दूं कि बोली के लिए जेल का मैं पक्षधर नहीं हूं।
तुम यक़ीनन पुनर्जन्म में भरोसा नहीं रखते होगे, मैं डिस्क्लेमर पहले लगा दूं मैं रखता हूं ... गांधी का हिन्दू हूं, हर धर्म में आस्था है सबको प्रेम करता हूं।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।
‘ जो कोई मेरी ओर आता हैं, चाहे किसी प्रकार से हो, मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।’
कई मनीषी हिन्दुत्व को लेकर, राष्ट्र को लेकर अपने विचार रख रहे हैं, उद्वेलित हो रहे हैं। वामपंथियों के अपने मत हैं, दक्षिणपंथियों की अपनी सोच ... मेरे जे़हन में करपात्री जी आते हैं जब वो कहते हैं प्राणियों में सद्भभावना हो ... वहां सिर्फ वामपंथ की तरह मज़दूरों की एकजुटता नहीं है या दक्षिणपंथ की तरह हिन्दू नहीं है। ये सोच कितनी व्यापक है, समग्र है। लेकिन चाहे वाम हो या दक्षिण वैचारिक मतभिन्नता को स्वीकार नहीं कर पाने की एक कमज़ोरी सी लगती है।
तुमने अपने भाषण के शुरुआत में सावरकर को हिन्दूवादी घोषित कर दिया, तुमने ये भी कहा कि उन्होंने अंग्रेजों से माफी मांगी थी, पर ये बताने से चूक गये कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और भाकपा जिसका इतिहास 1929 भी है, कोई 64 भी कहता है उस वक्त वाम विचाराधारा के लोगों ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की आलोचना की और सुभाष चंद्र बोस की भी तीखी निंदा की।
साथी तुम्हारे भाषण को पढ़ा सुना, तुम्हें बाबा साहेब पर बहुत भरोसा है होना भी चाहिए ... फिर तुम ये भी जानते होगे कि इस देश की संस्थाओं का आधार वही संविधान हो जो बाबा साहेब और उनके सहयोगियों की कलम से निकला था, ऐसे में देश की सर्वोच्च अदालत ने जो फैसला दिया उसपर अगर कोई ये कहे कि "अफज़ल के हत्यारों को"" तो मेरा सवाल है कि कौन हैं हत्यारे ?? संविधान या सुप्रीम कोर्ट। ये तर्क है कि सर्वोच्च अदालत ने फैसले में लिखा है "सामूहित अंतकरण की सुंतष्टि", पेज 80 आख़िरी पैरा लेकिन साथी ये "सिलेक्टिव परसेप्शन" है पूरे पैरा में सारे सबूतों का भी ज़िक्र है और यकीनन ये सबूत जिरह में काफी साबित हुए।
दूसरा मुद्दा शिक्षा के बजट को लेकर है, कई लोगों ने इसे लेकर आंदोलन किया ... सही भी है शिक्षा बजट में सरकार ने कमी की है, लिहाज़ा मैं भी आपके साथ हूं। लेकिन क्या कभी आपके संगठन ने उन लोगों के ख़िलाफ आवाज़ उठाई जो मौलिक अनुसंधान के नाम पर चोरी से पर्चे छपवाते रहते हैं, जो चोरी को हक़ समझ कर बैठे रहते हैं?
आपके पूरे संबोधन में ग़रीबों के तौर पर सिर्फ महिलाओं और मुस्लमानों की बात हुई सही है ... लेकिन गरीबी क्या धर्म देखकर आती है, क्या हिन्दू, सिख, ईसाइयों में ग़रीब नहीं है?? मनुवाद से आप हिन्दुओं को संबोधित कर रहे हैं, क्या इस्लाम में सैय्यद- जुलाहे के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता रखता है?
पूंजीवाद एक पार्टी की जागीर नहीं है, लेकिन निशाने पर सिर्फ बीजेपी-संघ रखने से मुद्दा कमज़ोर होता है, जिसकी सरकार लंबे अरसे तक रही अगर वो पार्टी संवेदना जताने पहुंचे तो समझिए ये सियासत है और कुछ नहीं।
दूसरे विश्वविद्यालयों में आपके साथी नगालैंड, कश्मीर के लिए भी आज़ादी मांगने लगे, ये भी अभिव्यक्ति की आज़ादी है, ये भी इसी महान देश ने दी है।
तुमने बिल्कुल सही कहा कौन है कसाब, कौन है अफज़ल गुरू ?? क्यों ये शरीर में बम बांधकर मरने को तैयार हो जाते हैं, इस पर यूनिवर्सिटी में बहस नहीं होगी तो और कहां होगी, बिल्कुल होगी ... ज़रूर करो ... लेकिन जो सुरक्षाकर्मी संसद पर तैनात थे या हमलों में पराग जैसे लड़के जो 10 साल तक कोमा में रहते हैं उनकी क्या ग़लती थी?? कभी सोचा है उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या थी, उनपर हमला क्यों हुआ इसपर बहस के लिए मंच तैयार रखा है!!
ठीक है ब्राह्मणों ने बहुत अन्याय किया, उनको सज़ा देना लेकिन जब बाबासाहेब ने कहा कि आरक्षण पर 10 साल में समीक्षा होना चाहिए और उसीको मोहन भागवत 60 साल बाद दुहराएं तो वो दलित विरोधी कैसे हो जाते हैं?? कभी सवाल पूछा है कि देवयानी ख्रोबागडे के आईएएस पिता की बेटी को और आगे तक भी आरक्षण जारी क्यों रहे?? क्यों देश के औसत में 45 फीसदी गरीबी रेखा से नीचे हैं तो 5 फीसदी ब्राह्मण आबादी के 55 फीसदी ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों पर बातचीत नहीं होती ?? उनको आगे लाने की क्या योजना है ??
मनुवाद-मनुवाद कहने से समस्या ख़त्म तो नहीं होगी ...
कोई बच्चा ब्राह्मण-राजपूत-दलित कोख चुनता नहीं है, वो हिन्दू के घर में पैदा हो या मुस्लमान के घर इस पर उसका अधिकार नहीं है ... ऐसे में जन्म से कबतक उसकी सज़ा तय होती रहेगी, इस सवाल को सिर्फ संघी कहकर टाला नहीं जा सकता !!
समस्या तो है लेकिन समाधान सिर्फ नारों से तो नहीं होगा ... समग्र विकास के लिये मज़दूर भी ज़रूरी हैं, पूंजीवादी भी ... ब्राह्मण भी दलित भी, हिन्दू भी मुस्लमान भी
इसलिए करपात्री जी को याद करो ... मार्क्स या लेनिन से बड़ी बात कही है "प्राणियों में सद्भभावना हो " ... दास कैपिटल से वक्त मिले तो कबीर को पढ़ना एक दोहे में सब समेट लिया है
साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय । मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय ॥

Wednesday, January 20, 2016

भूख ख़बर नहीं है ...




जो भूखे थे
वे सोच रहे थे रोटी के बारे में
जिनके पेट भरे थे
वे भूख पर कर रहे थे बातचीत
गढ़ रहे थे सिद्धांत
ख़ोज रहे थे सूत्र ....
कुछ और लोग भी थे सभा में
जिन्हौंने खा लिया था आवश्यकता से अधिक खाना
और एक दूसरे से दबी जबान में
पूछ रहे थे
दवाईयों के नाम ...
- कुमार विश्वबंधु

वो चुपचाप ऊंचे खंभे पर चढ़ गया क्योंकि कुछ लड़कों ने उसे कहा थाली में भरपेट खाना मिलेगा खंभे पर चढ़ जाओ ... फिर वो चुपचाप खंभे से उतर गया क्योंकि पुलिस वालों ने कहा थाली में भरपेट खाना मिलेगा खंभे से उतर जाओ।
अधनंगा था वो, भूखा-प्यासा ... लोग कह रह थे पागल है ...
वाकया मुंबई के परेल इलाके में हुआ ... वो परेल जहां कभी दर्जनों मिलें थीं, मज़दूर रहते थे। आज वहां एमएनसी दफ्तर, मॉल, पांच सितारा होटल हैं ... लोगों को रफ्तार देने मोनोरेल बन रही है, वो पागल उसी खंभे पर चढ़ा था... रोटी खाने।
टीवी पर बहस हो रही है, तमाम स्वनामधन्य संपादक रोहित से लेकर पाकिस्तान पर बहस कर रहे हैं, बातें वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम दुनिया में संभावित मंदी पर भी हैं। बातें दलित बनाम ग़ैर दलित की हैं, रोहित के पक्ष में खड़ा रहने की होड़ है ... ऐसे में ये बात अप्रिय लगेगी फिर भी कहूंगा ... 28 साल का रिसर्च स्कॉलर इतना कमज़ोर है कि चंद दिनों के निलंबन से जान दे देता है??  इनके संगठन का नाम है अंबेडकर-पेरियार सर्किल संस्था ने याकूब मेमन की फांसी का विरोध किया, उस याकूब को जिसे बार बार इंसाफ के रास्ते मिले आधी रात में भी ... लेकिन उन्हें इंसाफ देने वाला कोई नहीं था जो मुंबई बम विस्फोट में मारे गये। कौन से बाबा साहेब कोई बताएगा क्या सीख थी उनकी ?? " शिक्षित बनो संघर्ष करो ".. फिर कोई रोहित से सवाल तो पूछे उसने संघर्ष का रास्ता क्यों नहीं चुना??
   इस देश में एक ही जात है, एक ही धर्म है जिसमें पैदा होने वाला शख्स हर वक्त शोषित होता है वो है ग़रीबी !!वो ग़रीबी जिसके वजह से वो पागल खंभे पर चढ़ गया !!
लेकिन भूख़ ख़बर नहीं है। भूख़ पर सवाल उठते हैं तो मजमा नहीं लगता मंडलियां नहीं जमतीं। संपादकों को स्वाभाविक सवाल नहीं दिखता। मन परेशान है अपनी थाली से नाराज़गी है। भूख पर सवाल होते तो मंदिर-मस्जिद नहीं होता, मंडल-कमंडल नहीं होता सर्वण-दलितों की एक जात होती, हिन्दू-मुस्लमानों में भेद नहीं होता, पाकिस्तान में बम विस्फोट में किसी के मरने से भी हम ख़ुश नहीं होते, कोई कसाब 25000 रुपये के लिए पाकिस्तान से आकर हिन्दुस्तान में गोलियां नहीं चलाता, सीरिया की भूख से आंसू ज़ारो-क़तरा बहते।
     कोई अंबेडकर, कोई आरएसएस, कोई कांग्रेस सर्कल इस कमबख़्त भूख की बात क्यों नहीं करती। स्मृतियों से कमबख़्त वो पगला अधनंगा भी नहीं जाएगा। बहुत आसान है कहना पागल वो हैं जिन्होंने उसे खंभे पर चढ़ाया या वो जो भरी थाली के नाम पर खंभे पर चढ़ गया।
    पर आप कीजिए मालिक ख़ूब बहस कीजिए देश-दुनियां की तमाम मुसीबतों पर सबको सुलझा दीजिए !! वो पगला कहीं दिखे तो उसे पकड़ लीजिए ख़ूब मारिये, साले ने मेरी नींद ख़राब कर दी। आप सब चद्दर तानिये आराम सो जाइये सपने में अंबेडकर आएं, गोलवलकर आएं या गांधी एक सवाल कीजिएगा ज़रूर धूमिल के ज़रिये पूछ रहा हूं क्या आज़ादी तीन थके रंगों का नाम होता है, या उसका कोई ख़ास मतलब भी होता है।
पता लगे तो मेरे साथी सुनील सिंह, सांतिया या मुझसे संपर्क कीजिएगा
बाक़ी की ख़बरों के लिए लुटियन ज़ोन है !!
”भूख है तो सब्र कर, रोटी नही तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दा”

Friday, July 12, 2013

मैं गांधी का हिन्दू हूं ...

"वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ पराई जाणे रे,
पर दु:खे उपकार करे तो ये मन अभिमान न आणे रे।"

"सकल लोकमां सहुने वंदे निंदा न करे केनी रे,
वाच काछ मन निश्चल राखे धन धन जननी तेनी रे।"

"समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे,
जिह्वा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे।"

"मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे,
रामनाम शुं ताली रे लागी, सकल तीरथ तेना तनमां रे।"

"वणलोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे,
भणे नरसैयॊ तेनु दरसन करतां, कुल एकोतेर तार्या रे ॥"



नरसिंह मेहता की ये पंक्तियां गुजराती में हैं ... शायद मोदी जी बेहतर समझ पाएं ...
जब भी सुनता हूं, आंसू बरबरस आंखों का साथ छोड़ देते हैं, शायद यही वजह होगी कि ये भजन बापू की दिनचर्या का हिस्सा थे ...
मोदी जी, हम आपकी वजह से हिन्दू नहीं हैं ... पढ़िए और जानिए ... धर्म के मायने इस भजन के बहाने ...
ईश्वर का जन वही है जो दुसरे मनुष्य का दुःख समझ सकता है और दूसरों के दुःख में मदद करने को निम्न नहीं समझता है। वैष्णव जन वो है समस्त लोक के प्राणियों का आदर करता है, किसी की निंदा नहीं करता और मन, बोल,सोच सब में निश्छल है। ऐसे मनुष्य की जननी सचमुच धन्य है। ऐसे व्यक्ति ने स्वयं तृष्णा का त्याग किया है। पर-स्त्री माँ के सामान है उसके लिए। जीभ अगर थक भी जाए तो झूठ नहीं बोल सकता है  और दूसरे के धन को हाथ आने की लालसा नहीं होती है उसमें। इस इंसान के भीतर मोह माया का वास नहीं है और वैराग्य ही जीवन का सार है। राम नाम में विलीन है और तीर्थ स्थानों में वास है। ये मनुष्य न लोभी होते हैं, ना कपटी, काम क्रोध का त्याग किया है और ऐसे वैष्णव मनुष्य धन्य है, पूज्य हैं ।

Sunday, April 21, 2013

बस एक बार !!




सड़क पर लौट आई है भीड़ ...
फिर एक बार ...

फिर एक बार ...
'आप' ... 'हाफ ' ... के बैनर तले, चीखे़ जा रहे हैं नारे ... गढ़ी जा रही हैं नई क़समें
माइक पर, स्टूडियो से व्यवस्था के ख़िलाफ रटी जा रही हैं गालियां ...
बटोरी जा रही हैं तालियां ...

फिर एक बार ...
बलात्कार पर गरमा गई है बहस ... सब उतर आएं हैं लड़ने ...
नई बुश्शर्ट, नई लिपस्टिक, नई एैनक के साथ
मोर्चाबंदी कर, लिए जा रहे हैं ... लड़ने के कई-कई संकल्प

फिर एक बार
अपनी सामूहिक ताक़त के अहसास तले रौंदी जा रही हैं, गलियां
मुठ्ठी भींचें हाथ, उत्तेजक नारों से खौल रहा है शहर का पारा ...

फिर एक बार ...
वायदा हुआ है ... कड़े कानून को बनाने का ...
मौजूदा कानूनों को अमल में लाने का
संसद में बैठकर अपनी पीठ थपथपाने का

फिर एक बार
उसी भीड़ में, उसी सड़क पर, उसी संसद में हैं कई आंखें ...
जो शहर में शिकार ढूंढ रही हैं ....

फिर एक बार ...
अस्पताल में पड़ी है गुड़िया ...
जिसके लिए बलात्कार, हैवानियत, नारे-कसमों के मायने समझना बेहद मुश्किल हैं ...
जब बड़ी होगी गुड़िया तो पूछेगी हमसे सवाल
क्यों नहीं सुनाई दी हमें उसकी सिसकी ...
अस्पताल में लेटे उसकी चुप्पी से हम क्यों रहे बेख़बर

फिर एक बार ...
जानवर बन जाएंगें हम ...
जब धीरे-धीरे ठंडी पड़ जाएगी अंदर की आग ...
जाने ऐसी कितनी गुड़ियाओं को रोज़ घूर घूर उम्र से पहले हम जवानी की दहलीज़ पर ले आते हैं ...

कानून बनाने से ये नज़रें बदलेंगी
मोमबत्ती की रोशनी में कभी हम ख़ुद को टटोलेंगे ...

बस एक बार ....

माफ मत करना 'गुड़िया' ...



हममें से ही किसी हाथ ने नोच लिया तुम्हें ...
हममें से कोई हाथ 40 घंटे तुम्हारे आंसू नहीं पोछ पाया ...
हम हाथ जोड़ें भी तो माफ मत करना बिटिया ...
आख़िर सदियों पहले ... हम में से ही किसी हाथ ने खींचीं थी तुम्हारे लिए 'मर्यादा रेखा' ...

Monday, February 27, 2012

सामूहिक बलात्कार


हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि वो शराब पीती है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्यों वो घूमना चाहती है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि वो कपड़े पहनने की आज़ादी चाहती है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि वो तुम्हारी तरह भाषा चुनने की आज़ादी चाहती है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि उसका बार बार बलात्कार हो सकता है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि क़ानून, अदालत, समाज
सब उसका ही बलात्कार करेंगे ........

सामूहिक