Monday, February 27, 2012

सामूहिक बलात्कार


हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि वो शराब पीती है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्यों वो घूमना चाहती है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि वो कपड़े पहनने की आज़ादी चाहती है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि वो तुम्हारी तरह भाषा चुनने की आज़ादी चाहती है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि उसका बार बार बलात्कार हो सकता है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि क़ानून, अदालत, समाज
सब उसका ही बलात्कार करेंगे ........

सामूहिक

दस साल पहले ...



कुछ चीख़ें सुनी थी हमनें ...
दस साल पहले ...
कुछ लोग ज़िंदा जले थे
दस साल पहले ...
कुछ गोलियाँ भी चली थीं ...
दस साल पहले ...

कोई नहीं जानता कहां से आई थी वो चीख़ें ...
कोई नहीं जानता किसने मारा था उन्हें ...
कोई नहीं जानता किसने चलाई थी वो गोलियां ...
कोई कुछ नहीं जानता ।
सिवाए ... इसके कि कुछ लोग ज़िंदा हैं ... सालों से ... सालों तक रहेंगे ...
ये जानने के लिए ... जवाब मांगने के लिए ...
बस, इतना ही ।

Wednesday, February 15, 2012

मेरी पाती ...


मेरी पाती ...

120 घंटे से ज्यादा बीते ... 17 लाशें निकाली गईं ... मलबा हटने में 6 दिन से ज़्यादा लग गए ... हादसा 6 फरवरी सोमवार रात महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ, एक निर्माणाधीन बिल्डिंग गिरी .... पहले दिन दो लाशें निकली ... लेकिन उसके बाद मलबे के नीचे शुरुआती 4 दिनों में कितनी सांसें धड़क रही थीं पता नहीं ... कितनी सांसें ख़ामोश हो गईं ये भी 6 दिनों बाद पता लगा... ये हालात किसी दूर दराज़ के शहर के नहीं उस शहर के हैं जो महाराष्ट्र की दूसरी राजधानी है ... जहां बीजेपी के राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष के अलावा और भी कई दिग्गज रहते हैं, जहां अपनी महानगरपालिका है ... इन उपलब्धियां पर ये शहर इतराता लेकिन एक और हक़ीक़त सुनिए हादसे के घंटों बाद राहत और बचाव का काम शुरु नहीं हो पाया क्योंकि महानगरपालिका वाले इस शहर में खड़ी गाड़ियों में डीज़ल नहीं था ... उस शहर में मलबे में फंसे लोगों को निकालने में कोई फुर्ती नहीं दिखाई गई जहां देश का इकलौता सिविल डिफेंस कॉलेज है ...

और अब मेरे लिए सबसे दर्दनाक पहलू मौत के ये आंकड़े किसी के लिए सुर्खी नहीं ... अलबत्ता उस दिन शाहरुख का तमाचा ज़रूर हर अख़बार हर चैनल में सुर्खियां बटोर रहा था ...

क्या करें ... आप मुझे हारा हुआ कह सकते हैं ... गालियां दे सकते हैं क्योंकि मैं भी उसी सिस्टम में हूं ... कहता हूं निर्लज्ज हूं ... क्योंकि किसी बॉस पर चीख़ नहीं सकता ... कोने में दुबक कर लिखता हूं ... लगता है शायद कोई सुन ले ... कहीं चुनाव में कोटे-गठजोड़, जेनरल की उम्र, 2जी के बीच कोई समझे, कोई हुक्मरान रोए उन 16 ज़िंदगियों पर जो किसी और के ख्वाबों की ख़ातिर हमेशा के लिए सो गईं...

पिताजी कहते थे ... बेटा 25 तक कम्युनिस्ट रहोगे बाद में ज़िम्मेदारी आएगी तो सब भूल जाओगे ... चीख़कर जवाब देता था अपनी कमज़ोरी का मेडल मुझे मत दीजिए ... लेकिन वो शायद ठीक ही कहते थे ... आग तो बची नहीं कि दौड़कर वहां पहुंच जाऊं ... लिखने में भी कई दिन लग गए ... हर दिन कोई नई वजह कोई नई ख़बर ...
हर दिन चैनलों पर चौपाल बैठती है ... सहारा के स्पॉनरशिप लेने से, इस्राइली दूतावास पर हुए हमले तक सब पर चर्चा होती है ... इन मज़दूरों को कोई नहीं पूछता ...
ढोंग शायद मेरे अंदर तक भी भर चुका है ... नहीं तो कम से कम अपनी रोशनाई इतने दिनों तक बचा बचा कर नहीं रखता ... एक कमज़ोर शख्स जो अपने हिस्से की रोटी के लिए लड़ता रहता है, किसी और के लिए कुछ कहने लिखने पर भी बच बच कर रहता है ...
लिखते भी चैनलों पर नज़र जा रही है ... सबसे तेज़ पर लिखा आ रहा है ... ज़ुल्फों में लक ... कहीं चल रहा है राहुल की फाड़-नीति ...
उम्मीद तो नहीं कह सकता है ... ख़्वाब है ... शायद बदलेगा सबकुछ ...शायद मैं भी ...
एक दिन उठ जाऊं ... फैज़ के कुत्तों की तरह ...

ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते
कि बख़्शा गया जिन्हें ज़ौके-गदाई
ज़माने की फटकार सरमाया इनका
जहाँ भर की दुत्कार इनकी कमाई
ना आराम शब को ना राहत सवेरे
गलाज़त में होते हैं इनके बसेरे
जो बिगड़ें तो एक दूसरे से लड़ा दो
ज़रा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो
ये हर एक की ठोकर खाने वाले
ये फ़ाकों से उकता के मर जाने वाले
ये मज़लूम मख़लक गर सर उठाये
तो इंसान सब सरकशी भूल जाए
ये चाहें तो दुनियां को अपना बना लें
ये आकाओं की हड्डियाँ तक चबा लें
कोई इनको एहसासे-ज़िल्लत दिला दे
कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे

Wednesday, August 31, 2011

शोषित और शोषक ...




शोषितों के लिए ...
एक दिन उठे वो ...
और लिख डाला संविधान ...

शोषितों के लिए ...
एक दिन उठे वो ...
और बना दी संसद ...

शोषितों के लिए ...
एक दिन उठे वो ...
और बन गए शासक ...

फिर एक दिन ...
संसद में बैठकर, संविधान के पन्ने पलटकर ... शाषक बन गए शोषक ...
और शोषित ... पड़ा रहा ...
उस एक दिन के इंतज़ार में !!

Saturday, August 20, 2011

ननिहाल गई बिटिया के लिए ...




तुम्हारी आंखों में ना जाने कितने रंग हैं ...
वो माहताब की मानिंद चमकते हैं ...
लेकिन जब बरसते हैं ... तो लगता है ... बादल इस दिल में बरस जाएंगे ...
कभी लगता है तुम्हारी आंखों में कोई चितेरा बसता है ...
नहीं तो क्या मुमकिन है इन आंखों से इतनी रंग बिरंगी तस्वीरें बनाना ...
कहीं दुनियां के सारे रंग तुमने अपनी आंखों में कै़द तो नहीं कर लिये ...
क्या बात है कि जब चलती हो ... तो लगता है उम्र का एक फासला मैंने तय कर लिया ...
तुम्हारी नन्हीं थपकी से सुकने-ए-सफहे खुद भर जाते हैं ...
कभी सोचता हूं ... बाबा के सामने तुम हो सिर्फ कद में हो छोटी ... ओ मेरी नन्हीं सी प्यारी बेटी

Sunday, May 15, 2011

उम्र और मां


तुमने कभी देखा नहीं ... सिलबट्टा तुम्हारे हाथों में उतर आया है ...
तुमने घर सहेजा ... दरारें पैरों में सिमट आई हैं ...
तुम्हारी ऊंगलियों से रोटियों ने नरमी कब की छीन ली ...
तुमने कभी महसूस नहीं किया ... मौसम के थपेड़े तुम्हारी आंखों में दिखते हैं ...
हमारी मुश्किलें ... तुम्हारे चेहरे में झुर्रियों की मानिंद जड़ गई हैं ...
दिन और रात में वक्त ना जाने कब तुम्हारे बालों की कालिख ले गया
गुड्डे-गुड़िया की उम्र तुमने गौहाल में सोकर और मोहल्ले जैसे परिवार को पालने में निकाल दी ...

तुम्हारे चेहरे की रंगत भूरी हो गई है

मां मेरी बूढ़ी हो गई है

Wednesday, August 18, 2010

क्या आप मल विश्लेषण बीट अपनाएंगे...?


अमां, अगर मल विश्लेषण के लिए मनोचिकित्सक हो सकते हैं तो पत्रकार क्यों नहीं हो सकते...? य़कीन नहीं आता तो 'पीपली लाइव' देख लीजिए... फिल्म से बड़ी उम्मीदें तो नहीं पाली थीं, लेकिन दो गाने - 'चोला माटी के राम...' और 'सखी सइयां तो खूब ही कमात है, महंगाई डायन खाए जात है...' - दिल, कान और बटुए को हुई तकलीफ - सबको भा रहे थे... सोचा था, फिल्म में महंगाई, किसान और मीडिया का द्वंद्व होगा, लेकिन परेशान हुआ, क्योंकि फ़िल्म में न महंगाई को लेकर कोई संवाद, न किसान आत्मह्त्या क्यों करता है, इसकी जड़ में जाने की कोशिश... किसान सरकार से चंद रुपये हासिल करने के लिए आत्महत्या करता है, यह तर्क बहुत खोखला जान पड़ता है... एक तरह से यह उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला भी है, क्योंकि नगरों के जो लाल कभी गांव नहीं गए, उन्हें वाकई लगता है कि किसान पैसों के लिए कुछ भी करेगा... बंदर का नाच नचेगा... बकौल नत्था, किसी ठाकुर का गोड़ (पैर) भी पकड़ेगा...

टीवी के पत्रकार तो खैर, बॉलीवुड के लिए खुन्नस और बेवकूफी का विषय हैं ही... लेकिन हर पत्रकार टीआरपी की दौड़ में मल विश्लेषण करता या कद्दू में ओम ढूंढता दिखेगा, यह कहना भी सही नहीं है... यह सही है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया थोड़ी सनसनी, थोड़े मसाले में यकीन रखने लगा है, लेकिन इसके पीछे वजह भी बाज़ार है, अकेले माध्यम नहीं... आखिर विज्ञापन का मापदंड तो टीआरपी ही है... क्या फिल्म वाले प्रमोशन के लिए हर तरह के राइट्स बेचकर पैसा कमाने बाज़ार में नहीं उतरते... अब इसी फिल्म के सबसे हिट गाने को लिखने वाले के लिए आमिर के बटुए से कितने पैसे निकले, और गाने को बेचकर उन्होंने कितने पैसे कमाए, कोई उनसे जाकर पूछे...

कोई भी पत्रकार कद्दू में ओम या नत्था के मल विश्लेषण के लिए नहीं आता... किसी भी जर्नलिज्म स्कूल चले जाइए... अब यह पेशा चुनकर अपनाया जाता है, कइयों के पास दूसरे विकल्प होते हैं, लेकिन वे पत्रकार बनना चाहते हैं... सिर्फ सनसनी या ग्लैमर के लिए नहीं, बल्कि गंभीर पत्रकारिता के लिए भी... सरोकार और जनहित उसके ज़हन में होते हैं, लेकिन जब वह नौकरी करेगा तो उसे तनख्वाह भी चाहिए... महंगाई डायन उसे भी सताती है और चैनल मालिकों को भी...

पीपली लाइव - दरअसल एक और द्वंद्व से जूझ रही है... हिन्दी बनाम अंग्रेजी पत्रकारिता... फिल्म की निर्देशक शायद अंग्रेजी पत्रकारिता से जुड़ी रही हैं, इसलिए कहीं न कहीं थोड़ी प्रबुद्धता भी वह अंग्रेजी सेटअप में ही देखती हैं... हां, थोड़ा-बहुत एक छोटे हिन्दी अख़बार के पत्रकार में संवेदना भरकर फिल्म को बैलेंस करने की कोशिश ज़रूर की गई है...

मीडिया को आत्ममंथन और सुधार दोनों की ज़रूरत है, इससे इंकार नहीं, लेकिन सोचिए तो ऐसी फिल्में इसे एक मज़ाक के तौर पर पेश कर रही हैं... इनसे एक गंभीर ख़तरा यह है कि सिस्टम से निराश-हताश शख्स अब मीडिया को भी मज़ाक से ज्यादा और कुछ नहीं मानेगा...

मीडिया कुछ चीज़ें या कई चीज़ें गलत करता है, इससे भी इंकार नहीं, लेकिन मीडिया ग़लत ही करता है, यह कहना भी सही नहीं होगा...

फिल्म अभिनय और फ्लो के मामले में अच्छी है, लेकिन एक 'कम्प्लीट' फिल्म में थोड़ी कमी भी खटकती है... आख़िर में वही नया थियेटर के सारे कलाकार छत्तीसगढ़ी में बात करते हैं, जबकि उसी गांव के बाकी लोग बुंदेलखंडी में... मीडिया को कोसते-कोसते शायद संवाद लिखने में इन बातों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया...