Sunday, July 27, 2025

 कविता: "हमें आदेशों से ख़तरा है"


अब जब सदन की सीढ़ियाँ

सिर्फ़ मौन की छाया में चढ़ाई जाएँगी,

जहाँ नारे नहीं,

सिर्फ़ सत्ता के चरण-स्पर्श सुने जाएँगे

तो बताओ, क्या ये वही लोकतंत्र है

जिसकी नींव में प्रश्न दबे थे?


क्या अब जनप्रतिनिधि

सिर्फ़ हस्ताक्षर करने की मशीन हैं?

क्या संसद

केवल शपथों की फाइल है,

या आत्मा की गूंज जहाँ चुप रहने को

संविधान कहा जाए?


हमने देश को जाना था

एक आवाज़ की तरह

जो खेतों में फसल की तरह लहराए,

जो गलियों में बच्चों की हँसी बन जाए,

जो किताबों से निकले,

और तख़्तों पर इंक़लाब की स्याही छोड़ जाए।


मगर अब तो

हर सवाल को "अव्यवस्था" कहा जा रहा है,

हर विरोध “अशोभनीय”,

हर नाराज़गी “देशद्रोह”

और हर उम्मीद “अवांछित”।


सदन की दीवारों पर

अब भाषण नहीं, आदेश लिखे जा रहे हैं।

नारेबाज़ी पर रोक है,

प्रतीकों पर पाबंदी,

मानो विरोध का मतलब ही

देशद्रोह हो गया हो।


सालों पहले जिस आँख से

हमने लोकतंत्र देखा था,

वो आँख आज तलाश रही है

कि आख़िर देश में जनता कहाँ है?


हर तरफ़ ताले हैं

सिर्फ़ दुकानों पर नहीं,

ज़ुबानों पर भी।

हर तर्क से डरती सरकार

अब हर सवाल को

साजिश कहती है।


और हम?

हम चुप हैं

क्योंकि हमारे शब्दों की तलाशी ली जाती है।

हम चुप हैं

क्योंकि अब संसद नहीं,

सिर्फ़ सहमति का रंग मंच बचा है।


मगर याद रखो

अगर विरोध अस्वीकार्य हो

और आज़ादी प्रदर्शन की दुश्मन बन जाए,

तो सबसे बड़ा ख़तरा

देश की सुरक्षा से नहीं,

देश की चुप्पी से होता है।


हमें इस चुप्पी से ख़तरा है ...

हमें इस आदेश से ख़तरा है ....

हमें उस लोकतंत्र से ख़तरा है, जिसमें लोग तो हैं पर जनता नहीं ... 

Saturday, April 21, 2018

सामूहिक क़त्ल !

आहिस्ता-आहिस्ता
एक ख़ामोश साज़िश चल रही है ...
फिर एक दिन हो जाएगी
मौत...
कोई रपट नहीं लिखेगा
ना कोई मर्सिया पढ़ेगा...
ना होगा अंतिम संस्कार
जानती हो
बिटिया...
तुम जैसे-जैसे बड़ी होती जाओगी....
तुम्हारे बाप के अंदर की मां
सामूहिक रूप से मार दी जाएगी
आहिस्ता-आहिस्ता !

Friday, April 7, 2017

एक था इदलिब ....


इदलिब, माफ करना ओमरान दाक़नीश की एलेक्स से दोस्ती हम नहीं समझे...
तुम चाहते थे, ओमरान को घर पर लाना,झंडे, फूलों और ग़ुब्बारों के साथ उसका स्वागत करना....
तुम चाहते थे उसे परिवार देना, भाई कहना ....
कैथरीन भी तो उसके लिये तितलियों और जुगनू पकड़ने बाग़ में दौड़ती ...
फिर स्कूल में ओमर के साथ तुम सब खेलते ...
उसे जन्मदिन पर बुलाते, अपनी भाषा सिखाते... कैथरीन नीला बनी देती ...
और हां, तुम उसे जोड़ना और घटाना भी सिखाते ...

लेकिन माफ करना एलेक्स ...
इदलिब ने रौंद डाले उसके ज़ख्म ...
अब वो कभी नहीं लौटेगा ...
गोले-गोलियों और एक जहाज़ ने सुर्ख गुलाब के बागीचे को सफेद कर दिया ...
कुछ तो गिरा जिसने इदलिब के बच्चों के इंद्रधुनषी रंग चुरा लिये ...
तुम लोगों की तस्वीरें छिपा कर रख ली है मैंने अपने ज़ेहन में ...
कल दुनिया को दिखाऊंगा कि दूब पर गिरी है गिर्या-ए-शबनम
मैदान के कोने में उदास पड़ी वो फुटबॉल ...
भागते हुए उस बाप को जिसकी गोद एक सांस से दौड़ लगा रहा था...
लेकिन यकाय़क उन जह़रीले बादलों ने हर ख्वाब का दम घोंट दिया ...
ये शामे-ए-वीरां पूछेगी सवाल इंसानियत से ...
क्यों इदलिब के जैतून के खेतों में भर दिया ज़हर ...
माफ करना सीरिया ... इदलिब को दुनिया अख़बार के पन्ने पर समेट चुकी है...
हम फिर हो जाएंगे बेख़बर ...
माफी एलेक्स तुम्हारी मासूम सी छोटी ख्वाहिश,
ये बड़ी दुनिया पूरा नहीं कर सकती ...

Sunday, April 2, 2017

कृष्णम वंदे जगद गुरुम ...

प्रशांत जी के लिये खुला ख़त

आदरणीय प्रशांत जी आप विद्वान हैं, वकील हैं ... ऐसे में बग़ैर बात के आप बात नहीं लिखते होंगे ये मैं मानता हूं ... फिर कृष्ण और रोमियो को एक पलड़े में रखने में भी आपका कोई ध्येय होगा ... बहरहाल मेरे कृष्ण के लिये मेरे लिखने की कोई हैसियत नहीं है ... लेकिन मेरे कृष्ण अनुराग के प्रतीक हैं, सद्भभावना जानते हैं इसलिये मेरी आपसे कोई नाराज़गी नहीं है।

मैं मानता हूं कि शायद आपने आदि गुरू शंकराचार्य को पढ़ा होगा, नहीं भी पढ़ा हो तो कोई बात नहीं, श्रीमद भागवत पढ़ा होगा ... नहीं भी पढ़ा होगा तो कोई बात नहीं...
सिर्फ इतना बता दूं कि भागवत में राधा या रास का ज़िक्र नहीं है।
फिर भी कृष्ण-राधा-रास एक दूसरे के पूरक हैं, पर्याय हैं ... जानते हैं उन रसिकाओं के मन में सिर्फ और सिर्फ अपने कृष्ण को पाने की इच्छा थी। सामान्य भाषा में काम, क्रोध जैसे भाव जीवन के लिए सही नहीं माने जाते लेकिन जब बात अपने आराध्य के नजदीक जाने की हो तब कोई भी भाव गलत नहीं समझा जाता।

इसलिए आदिशंकर कहते हैं ... कृष्णं वंदे जगदगुरू

आपने एक पंक्ति में कृष्ण को रोमियो के समकक्ष खड़ा कर दिया, आपकी वकालत की किताबों में उसके लिये कुछ दलील होगी लेकिन क्या कृष्ण हमेशा नाचते गाते रहते थे, रास रचाते थे ... जनाब उन्होंने जीवन की प्रक्रिया को ही नृत्य बना लिया क्योंकि योगिक परंपरा में सृष्टि को हमेशा ऊर्जा या पांच भूतों के नृत्य के रूप में दर्शाया गया है। सृजन-प्रलय-प्रेम-सृष्टि सब नृत्य है ...
रास जीवंत है, परिस्थितियों से लड़ते वक्त निस्तेज नहीं होना ... जीवंत बने रहना मेरे श्रीकृष्ण रसिक हैं, लेकिन उनके रास में नैतिकता है सोलह हज़ार स्त्रियों को अपनाकर उन्होंने जो आदर्श बनाया उसको समझने में सालों लग गये लेकिन समझना मुश्किल है। रास में भाव, ताल, नृत्य, छन्द, गीत, रूपक सब है वो अलौकिक है आध्यात्मिक है।
आप ईश्वर को नहीं मानते, आप बिग-बैंग थ्योरी को मानते होंगे ( वैसे आपकी जानकारी के लिये 1930 की इस थ्योरी को कनाडा के विश्वविद्यालय ने 2016 में नकार दिया कहा कि ये बहुत गूढ़ है ) ... ऐसे में मेरे कृष्ण पर मेरा विश्वास मुझे कहता है इस ब्रह्मांड का विराट स्वरूप मेरे आराध्य का एक रूप है।
मेरे कृष्ण पुरूष तत्व है और गोपिकाएं प्रकृति तत्व, दोनों मिलाकर सृष्टि बनाते हैं। इसलिये हर गोपी के साथ वो हैं।
मेरा मकसद आपको ये बताना नहीं है कि मेरे जैसे असंख्य कैसे जनमाष्टमी में जल की एक बूंद के बग़ैर अपने आराध्य को याद करते हैं, अपने विश्वास को आप पर थोपना भी नहीं चाहता लेकिन थोड़ा पढ़िये कृष्ण पर आपने छेड़ने की तोहमत लगा दी... 13-14 वर्ष में तो उन्होंने कंस का वध कर दिया था ... इसके पहले वो गोपिकाओं को छेड़ते थे लेकिन क्या उसे एक बालक के काम या आसक्ति के तौर पर आप देखते हैं।
विज्ञान के पास सृष्टि के बनने में बिग बैंग थ्योरी के अलावा कुछ नहीं है ... बतौर छात्र मुझे इसमें कभी स्पष्टता नहीं दिखी ... कभी एक अग्रज को पढ़ते हुए शायद लगा कि शायद मैं इसके ज्यादा क़रीब हूं ... भारतीय वाङ्मय में देवता द्युतियों को कहा गया। वह अन्तरिक्ष वासी कहे गए। कृष्ण गोविन्द कहे गए। गो का एक अर्थ 'प्रकाश' भी है और विंद का अर्थ है - 'जो जानता है'।  यानी जो प्रकाश को जानता है।
राधा का एक नाम दाक्षायणी भी है। प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियों को 27 नक्षत्र माना गया। फिर अनुराधा एक नक्षत्र भी है। कृष्ण के भी दो अर्थ है - काला और आकर्षण करने वाला। क्या कृष्ण का प्रादुर्भाव खगोल में कृष्ण पिण्ड के द्वारा तारों, ग्रहों और अन्य आकाशीय पिंडों को अपनी ओर खींचनें का द्योतक है?

कृष्णं वन्दे जगतगुरुं -

ब्रह्मांड में सर्वाधिक गुरूत्व बल युक्त कृष्ण पिंड की वन्दना। कृष्ण ब्रह्मांड नायक थे। कोई भी उनके आकर्षण से बच नहीं सका। उनकी सोलह हज़ार रानियाँ थी। मुझे यह सब आकाश का वर्णन लगता है। यह लगता है मानो इस वैज्ञानिक सत्य को तत्कालीन लोक चेतना के हिसाब से कथाओं में ढाल दिया गया हो।

सर, मेरे कृष्ण जितने मुझमें हैं, उतने आप में ... इसलिये कोई अपशब्द नहीं ...
क्योंकि मेरे कृष्ण कहते हैं

मधुराधिपते रखिलं मधुरम 

Friday, March 31, 2017

अनारकली ऑफ आरा

डिस्क्लेमर - अविनाशजी पुराने सहयोगी हैं, ये फिल्म की समीक्षा नहीं है!

अनारकली ऑफ आरा देखने के बाद यशवंत भाई की वॉल पर फिल्म के बारे में पढ़ा ... मैंने फिल्म इसके बाद देखी ... डर भी लगा कि कहीं पैसे ज़ाया ना हो जाए, लिहाज़ा साभार उनकी कुछ पंक्तियों से शुरुआत कर रहा हूं ...
"फिल्म का ज्यादातर हिस्सा फूहड़ गानों, काम कुंठाओं, कामुकता, वासना और जुगुप्साओं से भरा पड़ा है. आपको मिचली भी आ सकती है. फिल्म का पिक्चराइजेशन पूरी तरह से अनुराग कश्यप मार्का बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन बन नहीं पाई है.
ऐसे दौर में जब बहुत अलग अलग किस्म के टापिक पर सुंदर फिल्में बन और हिट हो रही हैं, सिर्फ वासना वासना वासना और काम काम काम से बनी फिल्म का औचित्य समझ नहीं आता. अनारकली का दलाल बार बार अनारकली को छेड़ता नोचता परोसता दिखता है लेकिन इससे कोई दिक्कत नहीं अनारकली को. सोचिए, जिसकी मानसिक बुनावट सिर्फ देने लेने भर की हो उसे एक प्रभावशाली से दिक्कत क्या, बस इतने भर से कि यह सरेआम करने की कोशिश की गई. ये ठीक है कि बदन पर आपका हक है और आप तय करेंगी किसे देना लेना है, लेकिन जब आप चहुंओर देती परसोती दिखती हैं तो आपको लेकर कोई खास नजरिया नहीं कायम हो पाता"
स्क्रोल ने अपनी समीक्षा आलोक धन्वा जी की एक कविता से शुरू की थी ...
"तुम / जो पत्नियों को अलग रखते हो / वेश्याओं से / और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो / पत्नियों से /
कितना आतंकित होते हो / जब स्त्री बेखौफ भटकती है / ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व / एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों / और प्रेमिकाओं में! "
असमंजस था, आजकल कम फिल्में देखता हूं इसलिये .... अविनाश भाई की फिल्म थी इसलिये देखना भी था .... बहरहाल .... कई समीक्षाओं के द्वंद के बाद फिल्म देख डाली!!
मैं शुरुआत से उस बच्ची की आंखों से बिंध गया, जिसकी आंखों में नाच का आकर्षण लोगों की जिस्मानी लालच से परे था ... जिसकी मां की बेबसी उसकी मासूम आंखें देख रही थीं ... जो छलकीं लेकिन आंसू अपने अंदर समेट कर!!
आलोक जी की कविता और यशवंत भाई के लेख से बने कैनवास पर बेरंग आंसू ख़ुद-बख़ुद एक तस्वीर बनाने लगे ... "मसाला रियलिज्म" ... शायद ये शब्द सटीक लगे..
मुझे अजीब लगा कि आज क्या कोई वीसी यूनिवर्सिटी कैंपस में अनारकली को नचाने की हिमाक़त करेगा, सो मसाला तो है ... लेकिन इस मसाले से जुबान उस समाज की जलेगी जिसको उसके "लेने-देने" पर ऐतराज़ है .... यहां यशवंत भाई से एक सवाल पूछना लाज़िमी लगा कि "मानसिक बुनावट" लेने-देने की होती है या पेट की भूख की !!! अगर ऐसा था तो दिल्ली जाकर उसने ये आसान रास्ता क्यों नहीं चुना ?? क्योंकि अपनी मां के गाने सुनकर टेप से वो उलझती गई!! माइक ऐसा पकड़ा जैसे किसी ने प्यार की थपकी दी हो ... वो अनारकली जिसने खुद कहा था "हम कोई दूध के धुले नहीं हैं"!!
हमें उसके गानों पर ऐतराज़ है, मुझे भी है ... लेकिन सच्चाई भी है कि भिखारी ठाकुर पर भोजपुरी ने काम नहीं किया ... फिर अनारकली तो रोटी की भरमाई थी ... उसने अश्लीलता और मनोरंजन का आटा गूंथा ... लेकिन साफ किया कि "उसके गाने" "उसकी देह" नहीं है ... उसपर रंगीला का अधिकार हो सकता है बाहुबली वीसी का नहीं वो भी पब्लिक में .... क्या ग़लत कहा ???
उसका प्रतिरोध थका ... जब पूरा सिस्टम, मोहल्ला उसके ख़िलाफ खड़ा हो गया ...
वो भागी, कमज़ोर हुई .... लेकिन शायद एक लंबी छलांग के लिये
कई लोगों ने अनारकली को पिंक के सामने खड़ा किया ... पिंक शहरी लड़कियों की कहानी थी, उनका द्वंद था .... वहां "नो का मतलब नो" था ... लेकिन यहां ये आज़ादी आप नहीं देना चाहते ... क्योंकि अनारकली नाचती थी !!
उसी "अनारकली और अनवर" के लिये किसी तिवारी जी के आगे आने का भी बिंब है..ना इमोशंस की भरमार, बस दिल्ली के घर से जाते वक्त हाथ हिलाकर विदा कहना.. बताना कि इस लड़ाई में मौन समर्थन है, मर्दों की मर्दानगी को ललकारने के लिये!!!
हां सच है कि फिल्म की थीम नई नहीं है, आपको लगेगा कि ये "अर्धसत्य" वाला पैरलल सिनेमा नहीं है, ना ही फिल्लौरी वाला मेनस्ट्रीम ... आरा की अनारकली इनके बीच खड़ी है ...
सस्ती लिपस्टिक, भड़कीले कपड़ों में कमर मटकाती अनारकली जानती है कि उसके गानों का मतलब क्या है, वो पैसों के लिये कमरे में भी जाती है ... लेकिन अपनी शर्त पर ...
उस स्याह सच्चाई के हम आदी नहीं है ... "चहुंओर देने" की बेबसी हमें नहीं दिखती... नहीं दिखता उस समाज का विद्रूप चेहरा जो छोटी बच्ची को घूर-घूरकर जवान बना देता है।
ऐसे में वो पिंक से अलहदा लड़ाई लड़ती है, किसी मर्द की मदद के बग़ैर ...
लड़ाई जीतकर ... वो चलती है सुनसान सड़क पर ... उसे रंगीन घाघरे में ... वो मुस्कुराहट थी ... खुद के होने के यक़ीन पर ... उस अनारकली पर जिसे थोथले आदर्श नहीं समाज ने गढ़ा .... एक स्याह और रंगीन कैनवास के बीच!!!

Thursday, October 13, 2016

मेरी रगों की स्याही के लिये ...



बहुत मुश्किल है पिता पर लिखना ....
बहुत मुश्किल है, उनके लिये कुछ लिखना जो कुछ नहीं कहते ...
भरे रहते हैं तालाब की तरह, नदी की तरह नहीं बहते ...
घरभर की छांव के लिए, जो रोज़ धूप सहते ...
दुनियाबी तार सप्तक में जो रोज़ नये स्वर गहते
पापा...
टेलिफोन पर आपकी धड़कने सुन नहीं पाता ...
स्मृतियां ले जाती हैं, उस कैनवास पर ...
नन्हीं हथेली से जब तौलता था आपकी थपकी ...
आपके साये से चिपकी रहती थी मेरी आंखें ...
कैसे आपकी कमीज़ से मेरे सौदे पर खुश रहते थे आप ...
कैसे मां की घुड़की पर, मैं मान जाता था आपकी अठन्नी से ...
रोज़ आपकी लड़ाई देखता रहता था ...
देखता था कि कैसे पिता कभी नहीं हारते ...
आपकी लड़ाई में, मैं अपनी जीत ढूंढ ही लेता था ...
अलसाई सुबह और बिस्तर की सिकुड़न में टटोलता हूं आपको ...
शब्दों के भीतर आप आसानी से नहीं आते ...
तस्वीरों में, फोन की घंटी में ...
देख नहीं पाता आपके पैरों का दर्द, कहते नहीं आप ज़रा सिर पर हाथ फिरा दो...
और भी कई यादें हैं, पूरे घर में यहां वहां बिखरी पड़ी हैं ...
जब रात में देखता हूं तारे, मेरे अकेलेपन के आकाश में आ जाते हैं आप ...
मेरी उंगलियों में आप धड़कने लगते हैं, मेरी आंखें में सारे मंज़र हो जाते हैं कैद
जहां आपकी आवाज़ टूटती नहीं, अनंत तक मेरे साथ होती है ...
ना होता है दुख, ना बेचैनी .... सिवाय आपके मेरे उस अनंत में
पापा
जाने क्यों, आपमें मुझे थोड़ी-थोड़ी मां भी नज़र आती है ...
मेरी ख़ामोशी में छुपकर आपका जहां रहता है ..
हर दिन वो मुझसे यही कहता है ...
आप हैं तो है मेरा वजूद!

Thursday, February 18, 2016

साथी कन्हैया के लिए खुला ख़त

प्रिय कन्हैया,
मुझे नहीं पता तुम जेल से कब बाहर आओगे, मुझे ये भी पता है कि धर्म में तुम्हारी आस्था नहीं है, फिर भी कोशिश है अपने तर्कों के साथ तुम्हारे साथियों को मनाने की ... समझाने की कोशिश करूं ...
सबसे पहले बता दूं कि बोली के लिए जेल का मैं पक्षधर नहीं हूं।
तुम यक़ीनन पुनर्जन्म में भरोसा नहीं रखते होगे, मैं डिस्क्लेमर पहले लगा दूं मैं रखता हूं ... गांधी का हिन्दू हूं, हर धर्म में आस्था है सबको प्रेम करता हूं।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।
‘ जो कोई मेरी ओर आता हैं, चाहे किसी प्रकार से हो, मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।’
कई मनीषी हिन्दुत्व को लेकर, राष्ट्र को लेकर अपने विचार रख रहे हैं, उद्वेलित हो रहे हैं। वामपंथियों के अपने मत हैं, दक्षिणपंथियों की अपनी सोच ... मेरे जे़हन में करपात्री जी आते हैं जब वो कहते हैं प्राणियों में सद्भभावना हो ... वहां सिर्फ वामपंथ की तरह मज़दूरों की एकजुटता नहीं है या दक्षिणपंथ की तरह हिन्दू नहीं है। ये सोच कितनी व्यापक है, समग्र है। लेकिन चाहे वाम हो या दक्षिण वैचारिक मतभिन्नता को स्वीकार नहीं कर पाने की एक कमज़ोरी सी लगती है।
तुमने अपने भाषण के शुरुआत में सावरकर को हिन्दूवादी घोषित कर दिया, तुमने ये भी कहा कि उन्होंने अंग्रेजों से माफी मांगी थी, पर ये बताने से चूक गये कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और भाकपा जिसका इतिहास 1929 भी है, कोई 64 भी कहता है उस वक्त वाम विचाराधारा के लोगों ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की आलोचना की और सुभाष चंद्र बोस की भी तीखी निंदा की।
साथी तुम्हारे भाषण को पढ़ा सुना, तुम्हें बाबा साहेब पर बहुत भरोसा है होना भी चाहिए ... फिर तुम ये भी जानते होगे कि इस देश की संस्थाओं का आधार वही संविधान हो जो बाबा साहेब और उनके सहयोगियों की कलम से निकला था, ऐसे में देश की सर्वोच्च अदालत ने जो फैसला दिया उसपर अगर कोई ये कहे कि "अफज़ल के हत्यारों को"" तो मेरा सवाल है कि कौन हैं हत्यारे ?? संविधान या सुप्रीम कोर्ट। ये तर्क है कि सर्वोच्च अदालत ने फैसले में लिखा है "सामूहित अंतकरण की सुंतष्टि", पेज 80 आख़िरी पैरा लेकिन साथी ये "सिलेक्टिव परसेप्शन" है पूरे पैरा में सारे सबूतों का भी ज़िक्र है और यकीनन ये सबूत जिरह में काफी साबित हुए।
दूसरा मुद्दा शिक्षा के बजट को लेकर है, कई लोगों ने इसे लेकर आंदोलन किया ... सही भी है शिक्षा बजट में सरकार ने कमी की है, लिहाज़ा मैं भी आपके साथ हूं। लेकिन क्या कभी आपके संगठन ने उन लोगों के ख़िलाफ आवाज़ उठाई जो मौलिक अनुसंधान के नाम पर चोरी से पर्चे छपवाते रहते हैं, जो चोरी को हक़ समझ कर बैठे रहते हैं?
आपके पूरे संबोधन में ग़रीबों के तौर पर सिर्फ महिलाओं और मुस्लमानों की बात हुई सही है ... लेकिन गरीबी क्या धर्म देखकर आती है, क्या हिन्दू, सिख, ईसाइयों में ग़रीब नहीं है?? मनुवाद से आप हिन्दुओं को संबोधित कर रहे हैं, क्या इस्लाम में सैय्यद- जुलाहे के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता रखता है?
पूंजीवाद एक पार्टी की जागीर नहीं है, लेकिन निशाने पर सिर्फ बीजेपी-संघ रखने से मुद्दा कमज़ोर होता है, जिसकी सरकार लंबे अरसे तक रही अगर वो पार्टी संवेदना जताने पहुंचे तो समझिए ये सियासत है और कुछ नहीं।
दूसरे विश्वविद्यालयों में आपके साथी नगालैंड, कश्मीर के लिए भी आज़ादी मांगने लगे, ये भी अभिव्यक्ति की आज़ादी है, ये भी इसी महान देश ने दी है।
तुमने बिल्कुल सही कहा कौन है कसाब, कौन है अफज़ल गुरू ?? क्यों ये शरीर में बम बांधकर मरने को तैयार हो जाते हैं, इस पर यूनिवर्सिटी में बहस नहीं होगी तो और कहां होगी, बिल्कुल होगी ... ज़रूर करो ... लेकिन जो सुरक्षाकर्मी संसद पर तैनात थे या हमलों में पराग जैसे लड़के जो 10 साल तक कोमा में रहते हैं उनकी क्या ग़लती थी?? कभी सोचा है उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या थी, उनपर हमला क्यों हुआ इसपर बहस के लिए मंच तैयार रखा है!!
ठीक है ब्राह्मणों ने बहुत अन्याय किया, उनको सज़ा देना लेकिन जब बाबासाहेब ने कहा कि आरक्षण पर 10 साल में समीक्षा होना चाहिए और उसीको मोहन भागवत 60 साल बाद दुहराएं तो वो दलित विरोधी कैसे हो जाते हैं?? कभी सवाल पूछा है कि देवयानी ख्रोबागडे के आईएएस पिता की बेटी को और आगे तक भी आरक्षण जारी क्यों रहे?? क्यों देश के औसत में 45 फीसदी गरीबी रेखा से नीचे हैं तो 5 फीसदी ब्राह्मण आबादी के 55 फीसदी ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों पर बातचीत नहीं होती ?? उनको आगे लाने की क्या योजना है ??
मनुवाद-मनुवाद कहने से समस्या ख़त्म तो नहीं होगी ...
कोई बच्चा ब्राह्मण-राजपूत-दलित कोख चुनता नहीं है, वो हिन्दू के घर में पैदा हो या मुस्लमान के घर इस पर उसका अधिकार नहीं है ... ऐसे में जन्म से कबतक उसकी सज़ा तय होती रहेगी, इस सवाल को सिर्फ संघी कहकर टाला नहीं जा सकता !!
समस्या तो है लेकिन समाधान सिर्फ नारों से तो नहीं होगा ... समग्र विकास के लिये मज़दूर भी ज़रूरी हैं, पूंजीवादी भी ... ब्राह्मण भी दलित भी, हिन्दू भी मुस्लमान भी
इसलिए करपात्री जी को याद करो ... मार्क्स या लेनिन से बड़ी बात कही है "प्राणियों में सद्भभावना हो " ... दास कैपिटल से वक्त मिले तो कबीर को पढ़ना एक दोहे में सब समेट लिया है
साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय । मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय ॥

Wednesday, January 20, 2016

भूख ख़बर नहीं है ...




जो भूखे थे
वे सोच रहे थे रोटी के बारे में
जिनके पेट भरे थे
वे भूख पर कर रहे थे बातचीत
गढ़ रहे थे सिद्धांत
ख़ोज रहे थे सूत्र ....
कुछ और लोग भी थे सभा में
जिन्हौंने खा लिया था आवश्यकता से अधिक खाना
और एक दूसरे से दबी जबान में
पूछ रहे थे
दवाईयों के नाम ...
- कुमार विश्वबंधु

वो चुपचाप ऊंचे खंभे पर चढ़ गया क्योंकि कुछ लड़कों ने उसे कहा थाली में भरपेट खाना मिलेगा खंभे पर चढ़ जाओ ... फिर वो चुपचाप खंभे से उतर गया क्योंकि पुलिस वालों ने कहा थाली में भरपेट खाना मिलेगा खंभे से उतर जाओ।
अधनंगा था वो, भूखा-प्यासा ... लोग कह रह थे पागल है ...
वाकया मुंबई के परेल इलाके में हुआ ... वो परेल जहां कभी दर्जनों मिलें थीं, मज़दूर रहते थे। आज वहां एमएनसी दफ्तर, मॉल, पांच सितारा होटल हैं ... लोगों को रफ्तार देने मोनोरेल बन रही है, वो पागल उसी खंभे पर चढ़ा था... रोटी खाने।
टीवी पर बहस हो रही है, तमाम स्वनामधन्य संपादक रोहित से लेकर पाकिस्तान पर बहस कर रहे हैं, बातें वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम दुनिया में संभावित मंदी पर भी हैं। बातें दलित बनाम ग़ैर दलित की हैं, रोहित के पक्ष में खड़ा रहने की होड़ है ... ऐसे में ये बात अप्रिय लगेगी फिर भी कहूंगा ... 28 साल का रिसर्च स्कॉलर इतना कमज़ोर है कि चंद दिनों के निलंबन से जान दे देता है??  इनके संगठन का नाम है अंबेडकर-पेरियार सर्किल संस्था ने याकूब मेमन की फांसी का विरोध किया, उस याकूब को जिसे बार बार इंसाफ के रास्ते मिले आधी रात में भी ... लेकिन उन्हें इंसाफ देने वाला कोई नहीं था जो मुंबई बम विस्फोट में मारे गये। कौन से बाबा साहेब कोई बताएगा क्या सीख थी उनकी ?? " शिक्षित बनो संघर्ष करो ".. फिर कोई रोहित से सवाल तो पूछे उसने संघर्ष का रास्ता क्यों नहीं चुना??
   इस देश में एक ही जात है, एक ही धर्म है जिसमें पैदा होने वाला शख्स हर वक्त शोषित होता है वो है ग़रीबी !!वो ग़रीबी जिसके वजह से वो पागल खंभे पर चढ़ गया !!
लेकिन भूख़ ख़बर नहीं है। भूख़ पर सवाल उठते हैं तो मजमा नहीं लगता मंडलियां नहीं जमतीं। संपादकों को स्वाभाविक सवाल नहीं दिखता। मन परेशान है अपनी थाली से नाराज़गी है। भूख पर सवाल होते तो मंदिर-मस्जिद नहीं होता, मंडल-कमंडल नहीं होता सर्वण-दलितों की एक जात होती, हिन्दू-मुस्लमानों में भेद नहीं होता, पाकिस्तान में बम विस्फोट में किसी के मरने से भी हम ख़ुश नहीं होते, कोई कसाब 25000 रुपये के लिए पाकिस्तान से आकर हिन्दुस्तान में गोलियां नहीं चलाता, सीरिया की भूख से आंसू ज़ारो-क़तरा बहते।
     कोई अंबेडकर, कोई आरएसएस, कोई कांग्रेस सर्कल इस कमबख़्त भूख की बात क्यों नहीं करती। स्मृतियों से कमबख़्त वो पगला अधनंगा भी नहीं जाएगा। बहुत आसान है कहना पागल वो हैं जिन्होंने उसे खंभे पर चढ़ाया या वो जो भरी थाली के नाम पर खंभे पर चढ़ गया।
    पर आप कीजिए मालिक ख़ूब बहस कीजिए देश-दुनियां की तमाम मुसीबतों पर सबको सुलझा दीजिए !! वो पगला कहीं दिखे तो उसे पकड़ लीजिए ख़ूब मारिये, साले ने मेरी नींद ख़राब कर दी। आप सब चद्दर तानिये आराम सो जाइये सपने में अंबेडकर आएं, गोलवलकर आएं या गांधी एक सवाल कीजिएगा ज़रूर धूमिल के ज़रिये पूछ रहा हूं क्या आज़ादी तीन थके रंगों का नाम होता है, या उसका कोई ख़ास मतलब भी होता है।
पता लगे तो मेरे साथी सुनील सिंह, सांतिया या मुझसे संपर्क कीजिएगा
बाक़ी की ख़बरों के लिए लुटियन ज़ोन है !!
”भूख है तो सब्र कर, रोटी नही तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दा”

Friday, July 12, 2013

मैं गांधी का हिन्दू हूं ...

"वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ पराई जाणे रे,
पर दु:खे उपकार करे तो ये मन अभिमान न आणे रे।"

"सकल लोकमां सहुने वंदे निंदा न करे केनी रे,
वाच काछ मन निश्चल राखे धन धन जननी तेनी रे।"

"समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे,
जिह्वा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे।"

"मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे,
रामनाम शुं ताली रे लागी, सकल तीरथ तेना तनमां रे।"

"वणलोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे,
भणे नरसैयॊ तेनु दरसन करतां, कुल एकोतेर तार्या रे ॥"



नरसिंह मेहता की ये पंक्तियां गुजराती में हैं ... शायद मोदी जी बेहतर समझ पाएं ...
जब भी सुनता हूं, आंसू बरबरस आंखों का साथ छोड़ देते हैं, शायद यही वजह होगी कि ये भजन बापू की दिनचर्या का हिस्सा थे ...
मोदी जी, हम आपकी वजह से हिन्दू नहीं हैं ... पढ़िए और जानिए ... धर्म के मायने इस भजन के बहाने ...
ईश्वर का जन वही है जो दुसरे मनुष्य का दुःख समझ सकता है और दूसरों के दुःख में मदद करने को निम्न नहीं समझता है। वैष्णव जन वो है समस्त लोक के प्राणियों का आदर करता है, किसी की निंदा नहीं करता और मन, बोल,सोच सब में निश्छल है। ऐसे मनुष्य की जननी सचमुच धन्य है। ऐसे व्यक्ति ने स्वयं तृष्णा का त्याग किया है। पर-स्त्री माँ के सामान है उसके लिए। जीभ अगर थक भी जाए तो झूठ नहीं बोल सकता है  और दूसरे के धन को हाथ आने की लालसा नहीं होती है उसमें। इस इंसान के भीतर मोह माया का वास नहीं है और वैराग्य ही जीवन का सार है। राम नाम में विलीन है और तीर्थ स्थानों में वास है। ये मनुष्य न लोभी होते हैं, ना कपटी, काम क्रोध का त्याग किया है और ऐसे वैष्णव मनुष्य धन्य है, पूज्य हैं ।

Sunday, April 21, 2013

बस एक बार !!




सड़क पर लौट आई है भीड़ ...
फिर एक बार ...

फिर एक बार ...
'आप' ... 'हाफ ' ... के बैनर तले, चीखे़ जा रहे हैं नारे ... गढ़ी जा रही हैं नई क़समें
माइक पर, स्टूडियो से व्यवस्था के ख़िलाफ रटी जा रही हैं गालियां ...
बटोरी जा रही हैं तालियां ...

फिर एक बार ...
बलात्कार पर गरमा गई है बहस ... सब उतर आएं हैं लड़ने ...
नई बुश्शर्ट, नई लिपस्टिक, नई एैनक के साथ
मोर्चाबंदी कर, लिए जा रहे हैं ... लड़ने के कई-कई संकल्प

फिर एक बार
अपनी सामूहिक ताक़त के अहसास तले रौंदी जा रही हैं, गलियां
मुठ्ठी भींचें हाथ, उत्तेजक नारों से खौल रहा है शहर का पारा ...

फिर एक बार ...
वायदा हुआ है ... कड़े कानून को बनाने का ...
मौजूदा कानूनों को अमल में लाने का
संसद में बैठकर अपनी पीठ थपथपाने का

फिर एक बार
उसी भीड़ में, उसी सड़क पर, उसी संसद में हैं कई आंखें ...
जो शहर में शिकार ढूंढ रही हैं ....

फिर एक बार ...
अस्पताल में पड़ी है गुड़िया ...
जिसके लिए बलात्कार, हैवानियत, नारे-कसमों के मायने समझना बेहद मुश्किल हैं ...
जब बड़ी होगी गुड़िया तो पूछेगी हमसे सवाल
क्यों नहीं सुनाई दी हमें उसकी सिसकी ...
अस्पताल में लेटे उसकी चुप्पी से हम क्यों रहे बेख़बर

फिर एक बार ...
जानवर बन जाएंगें हम ...
जब धीरे-धीरे ठंडी पड़ जाएगी अंदर की आग ...
जाने ऐसी कितनी गुड़ियाओं को रोज़ घूर घूर उम्र से पहले हम जवानी की दहलीज़ पर ले आते हैं ...

कानून बनाने से ये नज़रें बदलेंगी
मोमबत्ती की रोशनी में कभी हम ख़ुद को टटोलेंगे ...

बस एक बार ....

माफ मत करना 'गुड़िया' ...



हममें से ही किसी हाथ ने नोच लिया तुम्हें ...
हममें से कोई हाथ 40 घंटे तुम्हारे आंसू नहीं पोछ पाया ...
हम हाथ जोड़ें भी तो माफ मत करना बिटिया ...
आख़िर सदियों पहले ... हम में से ही किसी हाथ ने खींचीं थी तुम्हारे लिए 'मर्यादा रेखा' ...

Monday, February 27, 2012

सामूहिक बलात्कार


हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि वो शराब पीती है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्यों वो घूमना चाहती है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि वो कपड़े पहनने की आज़ादी चाहती है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि वो तुम्हारी तरह भाषा चुनने की आज़ादी चाहती है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि उसका बार बार बलात्कार हो सकता है ...
हां, तुम बलात्कार कर सकते हो ...
क्योंकि क़ानून, अदालत, समाज
सब उसका ही बलात्कार करेंगे ........

सामूहिक

दस साल पहले ...



कुछ चीख़ें सुनी थी हमनें ...
दस साल पहले ...
कुछ लोग ज़िंदा जले थे
दस साल पहले ...
कुछ गोलियाँ भी चली थीं ...
दस साल पहले ...

कोई नहीं जानता कहां से आई थी वो चीख़ें ...
कोई नहीं जानता किसने मारा था उन्हें ...
कोई नहीं जानता किसने चलाई थी वो गोलियां ...
कोई कुछ नहीं जानता ।
सिवाए ... इसके कि कुछ लोग ज़िंदा हैं ... सालों से ... सालों तक रहेंगे ...
ये जानने के लिए ... जवाब मांगने के लिए ...
बस, इतना ही ।

Wednesday, February 15, 2012

मेरी पाती ...


मेरी पाती ...

120 घंटे से ज्यादा बीते ... 17 लाशें निकाली गईं ... मलबा हटने में 6 दिन से ज़्यादा लग गए ... हादसा 6 फरवरी सोमवार रात महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ, एक निर्माणाधीन बिल्डिंग गिरी .... पहले दिन दो लाशें निकली ... लेकिन उसके बाद मलबे के नीचे शुरुआती 4 दिनों में कितनी सांसें धड़क रही थीं पता नहीं ... कितनी सांसें ख़ामोश हो गईं ये भी 6 दिनों बाद पता लगा... ये हालात किसी दूर दराज़ के शहर के नहीं उस शहर के हैं जो महाराष्ट्र की दूसरी राजधानी है ... जहां बीजेपी के राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष के अलावा और भी कई दिग्गज रहते हैं, जहां अपनी महानगरपालिका है ... इन उपलब्धियां पर ये शहर इतराता लेकिन एक और हक़ीक़त सुनिए हादसे के घंटों बाद राहत और बचाव का काम शुरु नहीं हो पाया क्योंकि महानगरपालिका वाले इस शहर में खड़ी गाड़ियों में डीज़ल नहीं था ... उस शहर में मलबे में फंसे लोगों को निकालने में कोई फुर्ती नहीं दिखाई गई जहां देश का इकलौता सिविल डिफेंस कॉलेज है ...

और अब मेरे लिए सबसे दर्दनाक पहलू मौत के ये आंकड़े किसी के लिए सुर्खी नहीं ... अलबत्ता उस दिन शाहरुख का तमाचा ज़रूर हर अख़बार हर चैनल में सुर्खियां बटोर रहा था ...

क्या करें ... आप मुझे हारा हुआ कह सकते हैं ... गालियां दे सकते हैं क्योंकि मैं भी उसी सिस्टम में हूं ... कहता हूं निर्लज्ज हूं ... क्योंकि किसी बॉस पर चीख़ नहीं सकता ... कोने में दुबक कर लिखता हूं ... लगता है शायद कोई सुन ले ... कहीं चुनाव में कोटे-गठजोड़, जेनरल की उम्र, 2जी के बीच कोई समझे, कोई हुक्मरान रोए उन 16 ज़िंदगियों पर जो किसी और के ख्वाबों की ख़ातिर हमेशा के लिए सो गईं...

पिताजी कहते थे ... बेटा 25 तक कम्युनिस्ट रहोगे बाद में ज़िम्मेदारी आएगी तो सब भूल जाओगे ... चीख़कर जवाब देता था अपनी कमज़ोरी का मेडल मुझे मत दीजिए ... लेकिन वो शायद ठीक ही कहते थे ... आग तो बची नहीं कि दौड़कर वहां पहुंच जाऊं ... लिखने में भी कई दिन लग गए ... हर दिन कोई नई वजह कोई नई ख़बर ...
हर दिन चैनलों पर चौपाल बैठती है ... सहारा के स्पॉनरशिप लेने से, इस्राइली दूतावास पर हुए हमले तक सब पर चर्चा होती है ... इन मज़दूरों को कोई नहीं पूछता ...
ढोंग शायद मेरे अंदर तक भी भर चुका है ... नहीं तो कम से कम अपनी रोशनाई इतने दिनों तक बचा बचा कर नहीं रखता ... एक कमज़ोर शख्स जो अपने हिस्से की रोटी के लिए लड़ता रहता है, किसी और के लिए कुछ कहने लिखने पर भी बच बच कर रहता है ...
लिखते भी चैनलों पर नज़र जा रही है ... सबसे तेज़ पर लिखा आ रहा है ... ज़ुल्फों में लक ... कहीं चल रहा है राहुल की फाड़-नीति ...
उम्मीद तो नहीं कह सकता है ... ख़्वाब है ... शायद बदलेगा सबकुछ ...शायद मैं भी ...
एक दिन उठ जाऊं ... फैज़ के कुत्तों की तरह ...

ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते
कि बख़्शा गया जिन्हें ज़ौके-गदाई
ज़माने की फटकार सरमाया इनका
जहाँ भर की दुत्कार इनकी कमाई
ना आराम शब को ना राहत सवेरे
गलाज़त में होते हैं इनके बसेरे
जो बिगड़ें तो एक दूसरे से लड़ा दो
ज़रा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो
ये हर एक की ठोकर खाने वाले
ये फ़ाकों से उकता के मर जाने वाले
ये मज़लूम मख़लक गर सर उठाये
तो इंसान सब सरकशी भूल जाए
ये चाहें तो दुनियां को अपना बना लें
ये आकाओं की हड्डियाँ तक चबा लें
कोई इनको एहसासे-ज़िल्लत दिला दे
कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे

Wednesday, August 31, 2011

शोषित और शोषक ...




शोषितों के लिए ...
एक दिन उठे वो ...
और लिख डाला संविधान ...

शोषितों के लिए ...
एक दिन उठे वो ...
और बना दी संसद ...

शोषितों के लिए ...
एक दिन उठे वो ...
और बन गए शासक ...

फिर एक दिन ...
संसद में बैठकर, संविधान के पन्ने पलटकर ... शाषक बन गए शोषक ...
और शोषित ... पड़ा रहा ...
उस एक दिन के इंतज़ार में !!

Saturday, August 20, 2011

ननिहाल गई बिटिया के लिए ...




तुम्हारी आंखों में ना जाने कितने रंग हैं ...
वो माहताब की मानिंद चमकते हैं ...
लेकिन जब बरसते हैं ... तो लगता है ... बादल इस दिल में बरस जाएंगे ...
कभी लगता है तुम्हारी आंखों में कोई चितेरा बसता है ...
नहीं तो क्या मुमकिन है इन आंखों से इतनी रंग बिरंगी तस्वीरें बनाना ...
कहीं दुनियां के सारे रंग तुमने अपनी आंखों में कै़द तो नहीं कर लिये ...
क्या बात है कि जब चलती हो ... तो लगता है उम्र का एक फासला मैंने तय कर लिया ...
तुम्हारी नन्हीं थपकी से सुकने-ए-सफहे खुद भर जाते हैं ...
कभी सोचता हूं ... बाबा के सामने तुम हो सिर्फ कद में हो छोटी ... ओ मेरी नन्हीं सी प्यारी बेटी

Sunday, May 15, 2011

उम्र और मां


तुमने कभी देखा नहीं ... सिलबट्टा तुम्हारे हाथों में उतर आया है ...
तुमने घर सहेजा ... दरारें पैरों में सिमट आई हैं ...
तुम्हारी ऊंगलियों से रोटियों ने नरमी कब की छीन ली ...
तुमने कभी महसूस नहीं किया ... मौसम के थपेड़े तुम्हारी आंखों में दिखते हैं ...
हमारी मुश्किलें ... तुम्हारे चेहरे में झुर्रियों की मानिंद जड़ गई हैं ...
दिन और रात में वक्त ना जाने कब तुम्हारे बालों की कालिख ले गया
गुड्डे-गुड़िया की उम्र तुमने गौहाल में सोकर और मोहल्ले जैसे परिवार को पालने में निकाल दी ...

तुम्हारे चेहरे की रंगत भूरी हो गई है

मां मेरी बूढ़ी हो गई है

Wednesday, August 18, 2010

क्या आप मल विश्लेषण बीट अपनाएंगे...?


अमां, अगर मल विश्लेषण के लिए मनोचिकित्सक हो सकते हैं तो पत्रकार क्यों नहीं हो सकते...? य़कीन नहीं आता तो 'पीपली लाइव' देख लीजिए... फिल्म से बड़ी उम्मीदें तो नहीं पाली थीं, लेकिन दो गाने - 'चोला माटी के राम...' और 'सखी सइयां तो खूब ही कमात है, महंगाई डायन खाए जात है...' - दिल, कान और बटुए को हुई तकलीफ - सबको भा रहे थे... सोचा था, फिल्म में महंगाई, किसान और मीडिया का द्वंद्व होगा, लेकिन परेशान हुआ, क्योंकि फ़िल्म में न महंगाई को लेकर कोई संवाद, न किसान आत्मह्त्या क्यों करता है, इसकी जड़ में जाने की कोशिश... किसान सरकार से चंद रुपये हासिल करने के लिए आत्महत्या करता है, यह तर्क बहुत खोखला जान पड़ता है... एक तरह से यह उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला भी है, क्योंकि नगरों के जो लाल कभी गांव नहीं गए, उन्हें वाकई लगता है कि किसान पैसों के लिए कुछ भी करेगा... बंदर का नाच नचेगा... बकौल नत्था, किसी ठाकुर का गोड़ (पैर) भी पकड़ेगा...

टीवी के पत्रकार तो खैर, बॉलीवुड के लिए खुन्नस और बेवकूफी का विषय हैं ही... लेकिन हर पत्रकार टीआरपी की दौड़ में मल विश्लेषण करता या कद्दू में ओम ढूंढता दिखेगा, यह कहना भी सही नहीं है... यह सही है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया थोड़ी सनसनी, थोड़े मसाले में यकीन रखने लगा है, लेकिन इसके पीछे वजह भी बाज़ार है, अकेले माध्यम नहीं... आखिर विज्ञापन का मापदंड तो टीआरपी ही है... क्या फिल्म वाले प्रमोशन के लिए हर तरह के राइट्स बेचकर पैसा कमाने बाज़ार में नहीं उतरते... अब इसी फिल्म के सबसे हिट गाने को लिखने वाले के लिए आमिर के बटुए से कितने पैसे निकले, और गाने को बेचकर उन्होंने कितने पैसे कमाए, कोई उनसे जाकर पूछे...

कोई भी पत्रकार कद्दू में ओम या नत्था के मल विश्लेषण के लिए नहीं आता... किसी भी जर्नलिज्म स्कूल चले जाइए... अब यह पेशा चुनकर अपनाया जाता है, कइयों के पास दूसरे विकल्प होते हैं, लेकिन वे पत्रकार बनना चाहते हैं... सिर्फ सनसनी या ग्लैमर के लिए नहीं, बल्कि गंभीर पत्रकारिता के लिए भी... सरोकार और जनहित उसके ज़हन में होते हैं, लेकिन जब वह नौकरी करेगा तो उसे तनख्वाह भी चाहिए... महंगाई डायन उसे भी सताती है और चैनल मालिकों को भी...

पीपली लाइव - दरअसल एक और द्वंद्व से जूझ रही है... हिन्दी बनाम अंग्रेजी पत्रकारिता... फिल्म की निर्देशक शायद अंग्रेजी पत्रकारिता से जुड़ी रही हैं, इसलिए कहीं न कहीं थोड़ी प्रबुद्धता भी वह अंग्रेजी सेटअप में ही देखती हैं... हां, थोड़ा-बहुत एक छोटे हिन्दी अख़बार के पत्रकार में संवेदना भरकर फिल्म को बैलेंस करने की कोशिश ज़रूर की गई है...

मीडिया को आत्ममंथन और सुधार दोनों की ज़रूरत है, इससे इंकार नहीं, लेकिन सोचिए तो ऐसी फिल्में इसे एक मज़ाक के तौर पर पेश कर रही हैं... इनसे एक गंभीर ख़तरा यह है कि सिस्टम से निराश-हताश शख्स अब मीडिया को भी मज़ाक से ज्यादा और कुछ नहीं मानेगा...

मीडिया कुछ चीज़ें या कई चीज़ें गलत करता है, इससे भी इंकार नहीं, लेकिन मीडिया ग़लत ही करता है, यह कहना भी सही नहीं होगा...

फिल्म अभिनय और फ्लो के मामले में अच्छी है, लेकिन एक 'कम्प्लीट' फिल्म में थोड़ी कमी भी खटकती है... आख़िर में वही नया थियेटर के सारे कलाकार छत्तीसगढ़ी में बात करते हैं, जबकि उसी गांव के बाकी लोग बुंदेलखंडी में... मीडिया को कोसते-कोसते शायद संवाद लिखने में इन बातों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया...

Tuesday, February 9, 2010

शर्म आती है...


क्या कहूं... जब देश का कृषि, खाद्य आपूर्ति मंत्री किसी ठाकरे के दरबार पर जाकर मत्था टेक आता है... न न... किसानों की आत्महत्या या महंगाई रोकने के लिए नहीं (यह वे कर भी नहीं सकते), बल्कि आईपीएल में विदेशी खिलाड़ी खेल सकें, इसलिए... शर्म आती है...

एक ऐसे शहर में रहता हूं, जहां सरकार नाम की शायद कोई चीज़ नहीं... एक का ही राज है - ठाकरे... क्या आम, क्या ख़ास, सबको अमन से रहने, काम करने के लिए ठाकरे का ठप्पा चाहिए, वरना देश का एक तथाकथित जिम्मेदार मंत्री, पुलिस कमिश्नर या अपनी पार्टी के गृहमंत्री तक फरियाद नहीं ले जाता... शर्म आती है...

समझ नहीं आता, आखिर ऐसा क्यों है.... हर इजाज़त को 'मातोश्री' तक एड़ियां रगड़ने की दरकार क्यों होती है... क्या शर्मनाक बयान है - पहले बाल ठाकरे को प्रेजेंटेशन दिया जाएगा, और फिर अगर उन्हें अच्छा लगा, तब मुंबई में आईपीएल मैच खेले जाएंगे... शर्म आती है...

कौन हैं ठाकरे... आज तक उन्होंने कोई नगर निगम चुनाव तक नहीं लड़ा... वह चुने हुए जनप्रतिनिधि नहीं... फिर उन्हें इतनी इज्ज़त बख्शने का मतलब... क्या समाज और देश के लिए उन्होंने कोई ऐसा काम कर दिया है, जिसकी हमें भनक तक नहीं...

उस इंडस्ट्री की फिल्में देखता हूं, जिसमें शायद रीढ़ नहीं है... विदेश में बैठकर हीरो-सरीखे बयान देते हैं, लेकिन देश में आते हैं, तो नोट गंवा देने का डर तथाकथित बादशाह को भी घुटने टेकने के लिए मजबूर कर देता है... क्यों हर बार वह 'माई नेम इज़ खान' की दुहाई देता नज़र आने लगता है... अरे, हद है... धर्म की आड़ आप तब ही लेते हैं, जब फंसे होते हैं... याद रखिए खान साहब, जिन लोगों ने आपको सिर-आंखों पर बिठाया है, वे किसी एक धर्म या मज़हब से ताल्लुक नहीं रखते... फिर आपकी बातों में इतनी संकीर्णता क्यों आ जाती है...?

अरे, जो बातें सच हैं... जो बातें कहने का माद्दा रखते हो, उन पर टिकने की कूवत क्यों नहीं है आपमें... क्यों यह कहना पड़ता है कि 'मातोश्री' में मत्था टेकने से गुरेज़ नहीं... क्यों उस शख्स के सामने सिर झुकाना चाहते हैं, जिस पर दंगे भड़काने का इल्ज़ाम है... जो खुद को हिन्दू धर्म और उसके रीति-रिवाजों का पुरोधा कहता है, मराठी भाषा का खेवनहार बनता है, लेकिन खुद इस बात से भी इठलाता है कि माइकल जैक्सन ने उसके घर के गुसलखाने का इस्तेमाल किया... हमेशा विदेशी शराब पीता है, उसके बच्चे-पोते अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ते हैं, लेकिन आम मराठी को वह महज़ इसलिए पीठ में छुरा घोंपने वाला करार दे देता है, क्योंकि उसकी पार्टी चुनाव में हार जाती है...

कोई तो पूछे, ठाकरे सीनियर, जूनियर, रूठे कोई भी हों, शहर या देश को बनाने में उनकी क्या भूमिका है... फिर भी सब उनके सामने नतमस्तक होते हैं... अगर ये शख्स इतने ताकतवर हैं, वाकई 'टाइगर' हैं, तो फिर क्यों शहर आतंकी हमलों का शिकार होता है, क्यों इनके रहते आतंकी शहर को लहुलूहान कर जाते हैं, ये लोग रोक क्यों नहीं देते शहर में हो रही गुंडागर्दी को... ऐसे किसी वक्त में कहां रहती है शिवसेना और कहां रहते हैं इनके शिवसैनिक... क्या ठाकरे की बहादुरी सिर्फ पिच खोदने, वैलेटाइन्स डे पर बच्चों को मारने पीटने, और फिल्मों के पोस्टर फाड़ने में ही है...?

केन्द्र से युवराज आते हैं, कुछ बोलते हैं... लेकिन उनके मंत्रियों में इतनी हिम्मत भी नहीं जुटती, कि इस गुंडागर्दी के खिलाफ मुंह खोलें... और बोलकर नहीं, करके बताएं, जतलाएं - कि मुंबई किसी ठाकरे की जागीर नहीं...

अगर ऐसा नहीं होगा - तो वाकई इस शहर में रहने में, और बॉलीवुड की फिल्में देखने में कम से कम मुझे तो शर्म आएगी... आप अपना तय कर लीजिए... कम से कम अपने चुने हुए नुमाइंदों से पूछिए तो सही... जिन लोगों को आप सत्ता नहीं देते, उनके घर जाकर वे साष्टांग क्यों करते हैं... एक बार उनसे पूछकर देखिए - क्या उनको इस मौकापरस्ती, और इस डर पर शर्म नहीं आती..

Saturday, February 6, 2010

थियेटर नया हो गया... पुराना छूट गया...


कई दिनों से अपनी आत्मा - थियेटर - को ढूंढ रहा था... उसके साथ रूबरू होना चाह रहा था... लेकिन क्या करूं, कमबख्त क्रिकेट कवर करते-करते, अपनी ज़िंदगी भी ट्वेल्थ मैन सरीखी लगने लगी है... न्यूज़रूम की ज़िंदगी चाकरी से ज्यादा कुछ लगती ही नहीं... खैर, ये सब बातें फिर कभी... अभी मौसम है, अपने प्यार के साथ वक्त बिताने का...

कुछ महीने पहले मैं भोपाल में 'नया थियेटर' की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर मौजूद था... कई नाटक देखे - 'चरणदास चोर', 'आगरा बाज़ार', 'कामदेव का अपना, वसंत ऋतु का सपना' - लेकिन ऑडिटोरियम में बैठा हर शख्स शायद 'नया थियेटर' में पुराने हबीब तनवीर को ढूंढ रहा था... अजीब विडंबना थी, समकालीन आधुनिक चेतना के साथ जिस 'नया थियेटर' को हबीब साहब ने 1959 में शुरू किया था, उसकी ही 50वीं वर्षगांठ पर हबीब साहब स्टेज पर नहीं, स्टेज के नीचे बैठे थे... वह भी तस्वीर में...

'नया थियेटर' के कई नाटक मैंने कई बार देखे... कभी भोपाल, कभी दिल्ली में... उसी उत्साह से इस बार भी भरा हुआ था... भोपाल के इंदिरा गांधी मानव संग्रहालय में शो के दौरान तिल रखने की जगह नहीं थी... दर्शकों के भारी उत्साह की वजह से कुछ लोग ऑडिटोरियम के अंदर बैठे थे, और जिन्हें जगह नहीं मिली, वे प्रोजेक्टर पर नाटक देख रहे थे, लेकिन मैं कहीं और था... माफ कीजिए, किसी की काबिलियत को कमतर नहीं कर रहा, लेकिन सारे कलाकारों के बीच हबीब तनवीर का न होना खटक रहा था... मुझे लगा, शायद मंच पर यह कमी मुझे ही लग रही हो, शायद फिल्में देख-देखकर मेरे अंदर नाटक की समझ खत्म हो चली है... वजह परेशान करने वाली थी... नाटकों के लिए उमड़ी भीड़ के बीचोंबीच क्या मैं, और क्या मेरी सोच...

क्यों मैं 'जिन लाहौर नहीं वेख्या' की बूढ़ी दादी के किरदार में अपने मित्र बालो के नहीं रहने से परेशान हूं, क्यों मुझे स्टेज पर वह कैमिस्ट्री नज़र नहीं आ रही, क्यों मुझे हर कलाकार एकालाप करता नज़र आ रहा था... 'आगरा बाज़ार' देखते वक्त निगाहें पतंग की दुकान पर जाकर ठहर ही गईं, जहां हबीब साहब होते थे... 'चरणदास चोर' का सिपाही बहुत याद आया, जिसे मैंने लाठी थामे कई बार स्टेज और पोस्टरों में देखा था...

मन सालने लगा तो अपने साथी बासु मित्र, जो 'नया थियेटर' के पुराने कलाकारो का पुराना मित्र है, के साथ स्टेज के पीछे पहुंचा... मुलाकात हुई रविलाल सांगड़े से... सांगड़े 16 साल की उम्र से 'नया थियेटर' के साथ जुड़े हैं... जब उनसे हबीब साहब के न होने का जिक्र किया, सांगड़े जी ने कहा, मेरे लिए तो वह भगवान थे... उन्होंने मुझे रविया से रविलाल सांगड़े बनाया... आज बड़े-बड़े साहब मुझे रविलाल सांगड़े जी कहकर बुलाते हैं... सांगड़े 'नाचा पार्टी' में काम करते थे, हबीब साहब ने उन्हें देखा, और तब से वह 'नया थियेटर' से जुड़ गए...

खैर, अब नाम नहीं लिखूंगा... परंतु एक पुराने कलाकार ने कहा, साहब, हमन तो गांव के आदमी हैं, नाटक के अलावा और कुछ नहीं आता... पहले डरते थे, इत्ते लंबे-लंबे डॉयलाग याद कैसे करेंगे, लेकिन हबीब साहब सब करवा देते थे... पहले हबीब साहब थे, एक-एक डॉयलॉग पर घंटों लगा देते थे, लेकिन अब शहरी मन हैं, जो न हमारी सुनते हैं, न अनुभव बांटना चाहते हैं...

यह बात थोड़ी खटकी... शायद मुझे मेरी उकताहट, मेरी परेशानी का जवाब मिल रहा था... आखिरी दिन 'नया थियेटर' के निदेशक, पात्र-परिचय करवा रहे थे... खुद स्वीकारा कि जो जिम्मा हबीब साहब निभाते थे, उसे निभाने का सामर्थ्य या काबिलियत उनमें नहीं... फिर भी दर्शकों की मांग थी, जो मजबूरी बन गई... कई कलाकार ऐसे थे, जो दिल्ली, मुंबई, फिल्मों, सीरियल्स से छुट्टी लेकर नाटक करने भोपाल पहुंचे थे.... जज़्बा वाकई काबिले-तारीफ था... लेकिन शायद यह महज़ शौक था, आत्मा स्टेज पर नहीं थी....

हबीब साहब भी शहरी अभिजात्य वर्ग के थे... लेकिन 'नया थियेटर' बना, गंवइयों की टोली से, और उन्होंने कभी कलाकारों में भेदभाव नहीं किया... लेकिन अब वह स्टेज पर दिख रहा है... नाटकों का रिदम टूट रहा है... स्टेज पर कुछ कलाकार थियेटर वाले कम, फिल्म वाले ज्यादा दिख रहे हैं... पुराने कलाकारों में सारे वैसे नहीं, लेकिन कुछ ऐसे लग रहे हैं, जो थियेटर भी काम की तरह करने लगे हैं... उनकी आत्मा अब स्टेज पर नज़र नहीं आती...

लेकिन दिक्क़त सिर्फ थियेटर करने वालों के साथ नहीं है... कई बार हबीब साहब या लिटिल बैले ट्रूप जैसी महान संस्थाओं से जुड़े लोग ग्रुप के लिए वारिस खड़ा कर ही नहीं पाए... नतीजा, 'नया थियेटर' के पुराने होने के तौर पर सामने आ रहा है... वक्त है... चीजें बच सकती हैं... सबसे गुज़ारिश है, इन्हें बचा लीजिए...